यह फैसला वैश्विक ऊर्जा बाजार, भारत-रूस व्यापार संबंधों और अमेरिका की रूस नीति के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
By : Admin User | Updated at : 15 Jul 2026, 12:37 pm (IST)
रूसी तेल खरीदने वाले देशों को लेकर अमेरिका की नीति में बड़ा बदलाव सामने आया है। अमेरिकी सीनेट में पेश किए गए एक संशोधित विधेयक में रूस से कच्चा तेल और गैस खरीदने वाले देशों पर लगाए जाने वाले प्रस्तावित टैरिफ को काफी कम करने का सुझाव दिया गया है। पहले इस बिल में अधिकतम 500% टैरिफ लगाने का प्रावधान था, जिसे अब घटाकर 100% करने का प्रस्ताव रखा गया है।
इस बदलाव से रूस से बड़े पैमाने पर कच्चा तेल खरीदने वाले देशों, खासकर भारत और चीन, को राहत मिल सकती है। दोनों देश रूसी तेल के प्रमुख खरीदारों में शामिल हैं और अमेरिका के इस कदम से उन पर पड़ने वाला आर्थिक दबाव कम हो सकता है।
संशोधित बिल में क्या बदलाव हुए?
रूसी तेल और गैस खरीदने वाले देशों पर अधिकतम टैरिफ को 500% से घटाकर 100% करने का प्रस्ताव।
अमेरिकी राष्ट्रपति को कुछ परिस्थितियों में प्रतिबंधों से छूट देने का अधिकार दिया गया है।
यह विधेयक रूस पर आर्थिक दबाव बढ़ाने और यूक्रेन युद्ध से जुड़े मामलों में सख्ती के उद्देश्य से लाया गया है।
बिल को रिपब्लिकन और डेमोक्रेटिक दोनों दलों के सांसदों का समर्थन मिला है।
भारत और चीन पर क्या असर पड़ेगा?
भारत और चीन रूस से कच्चे तेल के सबसे बड़े खरीदारों में शामिल हैं। अगर यह संशोधित विधेयक आगे बढ़ता है, तो दोनों देशों पर पहले प्रस्तावित 500% टैरिफ की तुलना में कम आर्थिक दबाव पड़ेगा। इससे ऊर्जा आयात और व्यापार संबंधों पर संभावित असर भी सीमित हो सकता है।
पहले क्या था प्रस्ताव?
इससे पहले अमेरिका में रूस के खिलाफ सख्त प्रतिबंधों वाले एक प्रस्ताव में रूसी तेल खरीदने वाले देशों पर भारी टैरिफ लगाने की बात कही गई थी। इस प्रस्ताव को रूस पर दबाव बनाने की रणनीति के तौर पर देखा गया था, ताकि यूक्रेन युद्ध को लेकर मॉस्को पर प्रभाव डाला जा सके।
हालांकि, नए संशोधन के बाद टैरिफ को कम करने का प्रस्ताव सामने आया है। अब इस बिल को अमेरिकी कांग्रेस में आगे की प्रक्रिया से गुजरना होगा। जानकारों के मुताबिक, संशोधित प्रस्ताव के पारित होने की संभावना पहले वाले प्रस्ताव की तुलना में अधिक हो सकती है।
यह फैसला वैश्विक ऊर्जा बाजार, भारत-रूस व्यापार संबंधों और अमेरिका की रूस नीति के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है। आने वाले समय में यह देखना अहम होगा कि अमेरिकी कांग्रेस इस विधेयक पर क्या निर्णय लेती है और इसका अंतरराष्ट्रीय तेल बाजार पर कितना असर पड़ता है।
Published at : 15 Jul 2026, 12:37 pm (IST)
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